सफलता की सीढ़ी… सफलता जन्मसिद्ध अधिकार है, फिर मिलती क्यों नहीं ?

सफलता की सीढ़ी पर आगे बढ़ते हुए प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ अनेक परिकल्पनाओं का अनावश्यक भार अपने कंधों पर ढोते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जा रहा है, सफलता की सीढ़ी आपको यह विश्वास दिलाना चाहती है कि सफलता आप का जन्म सिद्ध अधिकार है, यह अधिकार आप जन्म लेते ही पहली सांस के साथ ही प्राप्त कर लेते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को सफल होने का समान एवं पूर्ण अधिकार प्रकृति के समान अनुपात में वितरित किया गया है और यदि आपको लगता है कि आप इसके अपवाद हैं तो आप गलत हैं। सफलता की सीढ़ी आपकी सुगबुगाहट सुन सकती है।
प्रश्न यह है कि यदि सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है तो सफल और असफल व्यक्तियों के अनुपात में इतना अंतर क्यों है? कभी आप विचार करिएगा कि प्रतियोगिता में असफल प्रतियोगियों की सूची लंबी और सफल प्रतियोगियों की सूची छोटी क्यों होती है? आखिर इतना अंतर क्यों?
आपने खरगोश और कछुए की कहानी तो सुनी ही होगी, जब कछुआ अपनी धीमी गति और स्थिरता से रेस जीत जाता है। चलिए इस कहानी के मूल तक जा कर इसमें छिपे सफलता के मंत्र को जानते हैं, इस कहानी में कछुए और खरगोश की मन: स्थिति समझते हैं- जैसे ही रेस प्रारंभ होने वाली थी वैसे ही खरगोश के दिमाग में एक ख्याल उठा। वह सोचने लगा यह रेस मैं ही जीतने वाला हूं, फिर एक ख्याल आया, यह कछुआ है धीमा और भारी और मैं हूं तेज, जीत निश्चित है, फिर उसके मस्तिष्क में विचार कौंधा कि रेस जीतकर मैं सभी को बता दूंगा कि मैं कितना तेज हूं, चारों ओर मेरी वाहवाही होगी। मेरे माता-पिता, मित्र व आस पड़ोसी मेरी इस जीत पर आश्चर्य करेंगे। यही कुछ सोच रहा था कि सहसा उसके दिमाग में एक और विचार आया यदि मैं रेस हार गया तो? यदि रेस में दौड़ते हुए बीच में चोट लग गई तो- मैं रेस हार जाऊंगा और यही सोचते-सोचते रेस प्रारंभ हो गई। खरगोश ने आव देखा ना ताव पूरा दम लगा कर दौड़ कर कछुए से काफी आगे निकल गया। दौड़ते हुए उसे चोट लगने का डर भी था साथ ही रेखा के पार अपनी जीत दिखाई देने लगी। चूंकि वह बिना सोचे समझे रेस के आधे रास्ते तक अपनी पूरी ताकत झोंक चुका था। अब उसे थकान व चोट का डर और अधिक सताने लगा। उसे लगा वह कछुए से काफी आगे निकल आया है तो कुछ देर सुस्ता लेने में क्या हर्ज है। उसका अति आत्मविश्वास उसे ये अभिमान दिलाने लगा कि वह तो इतना तेज दौड़ता है कि, वह कभी भी कछुए को पीछे छोड़ सकता है और रेस पूरी होने से पहले ही पेड़ के नीचे आराम करने लगा और उससे जो लापरवाही हुई उसे उसकी कीमत हार से चुकानी पड़ी। वहीं कछुआ अपनी सीमाओं और शक्तियों से पूरा वाकिफ था, उसे अपने सीमित संसाधनों पर विश्वास था। वह रेस जीतने के साथ-साथ एक अच्छा प्रतिभागी भी बनने आया था। उसे हार का डर नहीं था, ना ही कुछ खोने का डर, वह रेस में भाग लेने से आनंदित था, अपनी क्षमता का उत्तम प्रयोग कर जीत गया।
यहां खरगोश रेस की शुरुआत से अपने कांधे पर अतिरिक्त महत्वकांक्षा का मानसिक बोझ लिए रेस में उतरा था। यहां मैं आपको ये स्पष्ट कर दूं कि प्रतियोगी परीक्षा में मानसिक बोझ का वजन शारीरिक बोझ से कहीं अधिक होता है। अत: खरगोश रेस जीतने के सभी गुण रखते हुए भी रेस हार गया। आप यही सोच रहे हैं ना कि मैं बिल्कुल विपरीत तर्क दे रहा हूं क्योंकि हमें यही सिखाया और समझाया गया है कि यदि हमें आगे बढऩा है तो हमारी महत्वकांक्षाएं भी बड़ी होनी चाहिए और इसमें यदि मैं अपनी ओर से एक वाक्य और जोड़ दूं तो,
‘जितनी बड़ी महत्वकांक्षाएं जीवन में उतनी ही बड़ी असफलताओं की सम्भावनाएं।Ó
इस से पहले कि हम अपनी महत्वकांक्षाओं को समझें, हमें महत्वकांक्षी व्यक्ति की प्रकृति को समझना आवश्यक है। पहला -मस्तिष्क से महत्वकांक्षी .. ये वह महत्वकांक्षी हैं जिन पर महत्वकांक्षाएं थोपी जाती हैं या ये व्यक्ति किसी से प्रभावित हो कर या किसी चकाचौंध का पीछा कर इन महत्वकांक्षाओं को ओढ़ लेता है। ऐसी महत्वकांक्षाएं व्यक्ति की स्वयं की नहीं हो कर मात्र बाहरी आकर्षणों के वेग से प्रेरित होतीं हैं, भले व्यक्ति की रुचि से प्रेरित हों या नहीं।
वह व्यक्ति लोगों की सोच, इच्छा और दृष्टिकोण के आधार पर अपना लक्ष्य निर्धारित करता है, ऐसे लक्ष्य उस व्यक्ति में खरगोश की तरह ही महत्वकांक्षाओं के सकारात्मक व नकारात्मक भावों की बाढ़ ला देते हैं। ऐसे भावों के साथ मानव मन उस कार्य में कदापि केंद्रित हो कर नहीं लगता। दूसरों द्वारा थोपी गयी महत्वाकांक्षा आपको अपने लक्ष्य प्राप्ति में पूरी तरह समर्पित नहीं कर सकती अपितु संशयों से भर देती है और यदि ऐसा व्यक्ति अपने कठोर श्रम से लक्ष्य प्राप्ति में सफल हो भी जाता है तो अव्वल तो रुचिकर ना होने से लक्ष्य प्राप्ति में उसे दूसरों से कहीं अधिक परिश्रम और समय उसमें लगाना पड़ता है इसके बावजूद भी यह सफलता उसे संतुष्टिप्रद नहीं लगती है। तो ऐसी सफलता का फायदा क्या जब आप अपने कार्य, अपनी भावनाओं से सदैव रुष्ट व असंतुष्ट रहें।
दूसरा – मन से महत्वकांक्षी व्यक्ति – मस्तिष्क से विपरीत मन से महत्वकांक्षी व्यक्ति पर परिणाम, सफलता, सफलता के बाद की परिस्थिति व सफलता की प्रतिक्रियाओं का कोई प्रभव नहीं पड़ता। ऐसा व्यक्ति अपने लक्ष्य प्राप्ति के कार्य में तन्मयता से लग जाता है और मन से किए कार्य के आनंद का तो कहना ही क्या। ऐसे व्यक्ति का ध्यान लक्ष्य प्राप्ति के कार्यों में लगता है ना कि लक्ष्य प्राप्ति के पश्चात की परिस्थितियों की कल्पना में। ऐसा व्यक्ति या प्रतियोगी अपने मन से महत्वकांक्षाओं को पूरा करने में लगता है तो उसके लिए सफलता – असफलता अथवा हार – जीत का कोई फर्क नहीं पड़ता, वह केवल अपने रुचिकर कर्म में ही आनंदित रहता है।
अंत में सफलता की सीढ़ी यह निर्णय आप पर छोड़ती है कि आप स्वयं आत्मविश्लेषण करके निर्धारित करें कि आप उपरोक्त में से किस श्रेणी के महत्वाकांक्षी बन अपनी सफलता के सोपान चढऩा चाहते हैं क्योंकि सफलता का मार्ग बहुत लम्बा और थकान भरा है। यह स्वयं आपको निर्धारित करना होगा कि आप दूसरों द्वारा थोपी गयी या लादी गयी महत्वकांक्षाओं का अतिरिक्त भार लाद कर लक्ष्य की और उबाऊ बोझिल रास्ते से बढऩा चाहते हैं या फिर स्वयं के मन की महत्वकांक्षाओं से प्रेरित हो आनंदित एवं उत्साहित सफर से सफलता तक पहुंचना चाहते हैं।
विश्व की विडम्बना तो देखिए कि अधिकांश लोग महत्वकांक्षा का बाहरी आडम्बर ओढ़ कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की अंधी दौड़ में भागते हैं। फलस्वरूप सदैव असफलता की सूची सफलता की सूची से लम्बी देखी गयी है जबकि मन से महत्वकांक्षी नित नए सफलता के आयाम पाते हैं।
‘सफलता के सफर में महत्वकांक्षाओं का बोझ जितना कम लादोगे, लक्ष्य तक का सफर उतना ही अधिक आनंददायी होगा।Ó

अभिषेक लट्टा - प्रभारी संपादक मो 9351821776

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